Tuesday, April 18, 2017

क्षणिकाएं

    (1)
चहरे पर जीवन के
उलझी पगडंडियां
उलझा कर रख देतीं
जीवन के हर पल को,
जीवन की संध्या में
झुर्रियों की गहराई में
ढूँढता हूँ वह पल
जो छोड़ गये निशानी
बन कर पगडंडी चहरे पर।

    (2)
होता नहीं विस्मृत
छोड़ा था हाथ
ज़िंदगी के
जिस मोड़ पर।
ठहरा है यादों का कारवां
आज भी उसी मोड़ पर,
शायद देने को साथ
मेरे प्रायश्चित में
थम गया है वक़्त भी
उसी मोड़ पर।


    (3)

आसान कहाँ हटा देना
तस्वीर दीवार से
पुराने कैलेंडर की तरह,
टांग देते नयी तस्वीर
पुरानी ज़गह पर,
लेकिन रह जाती
खाली जगह तस्वीर के पीछे
दिलाने याद उम्र भर।

...©कैलाश शर्मा 

15 comments:

  1. बहुत खूब ... तीनों लाजवाब ... और आखरी तस्वीर वाली दिल में उतर जाती है ...

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  2. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" गुरुवार 20 अप्रैल 2017 को लिंक की गई है.... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  3. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन अंजू बॉबी जॉर्ज और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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  4. बहुत सुंदर आपकी रचना लाज़वाब👌👌

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  5. एक क्षणिका कितनी प्रभावशाली हो सकती है कभी-कभी जीवनभर के लिए हमारे साथ चिपक सकती है इसकी सुन्दर बानगी हैं आदरणीय कैलाश शर्मा जी की क्षणिकाएं। बधाई।

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  6. बहुत ही सुन्दर।

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  7. तीनों ही क्षणिकाएं बहुत खूबसूरत हैं , भावनाओं को व्यक्त करती हुई लेकिन मुझे आखिरी वाली बहुत ही सुन्दर और प्रभावी लगी ! जब आपके पास मौका होता है तुलना हो ही जाती है :-)

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  8. यादों का कोलाज...

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  9. होता नहीं विस्मृत
    छोड़ा था हाथ
    ज़िंदगी के
    जिस मोड़ पर।
    ठहरा है यादों का कारवां
    आज भी उसी मोड़ पर,
    शायद देने को साथ
    मेरे प्रायश्चित में
    थम गया है वक़्त भी
    उसी मोड़ पर।
    भावनाओं को सजीव करते शब्द, भावनापूर्ण अभिव्यक्ति। सुंदर

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  10. बहुत सुन्दर

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  11. आपकी लिखी रचना "मित्र मंडली" में लिंक की गई है http://rakeshkirachanay.blogspot.in/2017/04/16.html पर आप सादर आमंत्रित हैं ....धन्यवाद!

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  12. वाह ! क्या बात है! बहुत ही खूबसूरत प्रस्तुति ! बहुत सुंदर आदरणीय।

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