Tuesday, March 31, 2015

क्षणिकायें

ज़िंदगी के थपेड़े 
सुखा देते अहसास 
और मानवीय संवेदनाएं
बना देते पत्थर
और तराश देता समय 
एक बुत जीते जी।
क्या तुमने सुनी है
मौन चीत्कार उसकी
जिसे बना दिया बुत
ज़िंदगी के हालातों ने।
    ***
उखाड़ता हूँ जड़ से 
रोज़ सुबह एक पौधा यादों का,
फ़िर उग आता पौधा नया
हर शाम को ज़मीन से
और चुभने लगते कांटे रात भर।
न जाने छुपे हैं कितने 
बीज यादों के ज़मीन में
जो उग आते रोज़ शाम ढले।
    ***
जब भी पाया अकेला 
दिया तुमने साथ 
नहीं छोड़ा हाथ 
एक भी पल को।
मेरे दर्द,
न छोड़ना साथ
मेरे सपनों की तरह,
मुश्किल होगा जीना 
बिखर जायेगा अस्तित्व
तुम्हारे बिना।

...कैलाश शर्मा 

Sunday, March 08, 2015

महिला दिवस

समर्पित किया तुम्हें 
जीवन का एक एक पल, 
तुम्हारी खुशियों के लिए 
भुला दिए अपने सपने, 
केवल देकर के एक दिन
चाहते चुकाना अपना ऋण?

यह एक दिन भी मेरा कहाँ?
इस दिन का फैसला तुम्हारा,
कहाँ जी पाते यह दिन भी 
स्व-इच्छानुसार.

रहने दो अपना यह अहसान,
अगर दे सको तो देना 
प्रेम, सम्मान, सुरक्षा 
जो है मेरा अधिकार.
इतनी भी नहीं कमज़ोर
जो मांगूं भीख अधिकार की,
अब नहीं चाहती बनना
केवल अनुगामिनी,
जिस दिन बन पाऊँगी सहगामिनी 
जीवन के हर क्षेत्र में
नहीं होगा केवल एक दिन मेरे लिए.

....कैलाश शर्मा