Saturday, May 19, 2012

श्रीमद्भगवद्गीता-भाव पद्यानुवाद (आठवीं-कड़ी)


द्वितीय अध्याय
(सांख्य योग - २.३८-४४)


सुख दुःख, लाभ हानि सम,
हार जीत न चिंतित करते.
जो ऐसा सोच युद्ध में उतरें,
वे नहीं पाप के भागी बनते.


सांख्य बुद्धि बतलाई अब तक,
कर्म योग मैं अब बतलाता.
पाकर कर्म योग बुद्धि को
छूट कर्म बंधन नर जाता.



करते जो प्रारम्भ कर्म है,
उसका नाश नहीं होता है.
न विपरीत है फल ही मिलता,
न जन्म मृत्यु भय ही होता है.


कर्म योग का जो साधक है,
स्थिर एकनिष्ठ बुद्धि है होती.
अविवेकी फल इच्छुक जो है,
उस की अनंत कामना होती.


वेद वाक्य में प्रीति है जिनको
वेदों को ही सब कुछ मानें.
बहकाते हैं वे सब जन को,
कर्मकाण्ड से न आगे जानें.


हैं आसक्त कामनाओं में जो
पुरुषार्थ बस स्वर्ग प्राप्ति.
कर्म काण्ड का वर्णन करते,
होती जिनसे फल की प्राप्ति.


भोग और ऐश्वर्य प्राप्ति को
विभिन्न क्रियायें वे बतलाते.
जो ऐश्वर्य, भोग के इच्छुक,
स्थिर एकनिष्ठ बुद्धि न पाते.


                .......क्रमशः 


कैलाश शर्मा 

19 comments:

  1. हर बार की तरह बहुत बढ़िया ।

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  2. वेद वाक्य में प्रीति है जिनको
    वेदों को ही सब कुछ मानें.
    बहकाते हैं वे सब जन को,
    कर्मकाण्ड से न आगे जानें... गहन

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  3. वाह, स्पष्ट, पूरी तरह..

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  4. गहन भाव लिये उत्‍कृष्‍ट प्रस्‍तुति ...आभार ।

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  5. हैं आसक्त कामनाओं में जो
    पुरुषार्थ बस स्वर्ग प्राप्ति.
    कर्म काण्ड का वर्णन करते,
    होती जिनसे फल की प्राप्ति.

    बहुत उत्‍कृष्‍ट रचना,..अच्छी प्रस्तुति

    MY RECENT POST,,,,काव्यान्जलि ...: बेटी,,,,,
    MY RECENT POST,,,,फुहार....: बदनसीबी,.....

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  6. बहुत अच्छी प्रस्तुति!
    इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार के चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ!

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  7. कर्म योग का जो साधक है,
    स्थिर एकनिष्ठ बुद्धि है होती.
    अविवेकी फल इच्छुक जो है,
    उस की अनंत कामना होती.........सुन्दर प्रस्तुति आभार...

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  8. सांख्य बुद्धि बतलाई अब तक,
    कर्म योग मैं अब बतलाता.
    पाकर कर्म योग बुद्धि को
    छूट कर्म बंधन नर जाता.
    बहुत बढ़िया खुद बा खुद सन्देश देती हमारी सीमाओं को रेखांकित करती पोस्ट .एक पूरी पीढ़ी है जो वेद के बाहर सोच ही नहीं पाती उसने ज्ञान की भी हदबंदी कर रखी है .

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  9. आदरणीय शर्मा साहब ! यह नितांत मेरा निजी संभाषण है ,क्षमा प्रार्थी हूँ - जैसी यह विषय-वस्तु है, कालानुरूप शब्द व शिल्प का ध्यान रखा जाये तो ,आकर्षण और लालित्य और बढ़ जाता .........अच्छा प्रयास

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    1. आदरणीय उदय वीर सिंह जी, गीता गहन ज्ञान का सागर है. मेरा प्रयास है कि अनुवाद को मूल भाव के निकटतम रखते हुए, इसे सरल, सहज, और बोलचाल की भाषा में अभिव्यक्त करूं जिससे वह जन साधारण को बोधगम्य रहे. आपके सुझाव के लिये आभार.

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  10. Kamalka anuwad kar rahe hain aap!

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  11. बहुत ही बेहतरीन और प्रशंसनीय प्रस्तुति....


    इंडिया दर्पण
    की ओर से आभार।

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  12. भोग और ऐश्वर्य प्राप्ति को
    विभिन्न क्रियायें वे बतलाते.
    जो ऐश्वर्य, भोग के इच्छुक,
    स्थिर एकनिष्ठ बुद्धि न पाते.
    गहन भाव !

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  13. बहुत सुंदर और सार्थक प्रस्तुति. बधाई और धन्यबाद.

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  14. कर्म योग का जो साधक है,
    स्थिर एकनिष्ठ बुद्धि है होती.
    अविवेकी फल इच्छुक जो है,
    उस की अनंत कामना होती.
    कर्मयोग की परिभाषा कितने सरल शब्दों में... आभार!

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  15. aapki prastuti man ko chetna pradaan karti hai.
    saral aur bodhgamy,

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